Mar 19, 2026
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रामनगर वन प्रभाग बाघों के लिए जीपीएस और हाई-टेक निगरानी प्रणालियों के साथ गश्ती दस्तों का करेगा आधुनिकीकरण

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देहरादून। उत्तराखंड में बाघों के संरक्षण को लेकर अब नई गति मिलने जा रही है। भारत सरकार ने राज्य के टाइगर रिजर्व से बाहर स्थित वन प्रभागों के लिए 5.40 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया है। इस धनराशि से बाघों की सुरक्षा, उपचार और निगरानी के लिए आधुनिक संसाधन विकसित किए जाएंगे, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में भी मदद मिलेगी।

राज्य के कार्बेट टाइगर रिजर्व से सटे लैंसडोन, रामनगर और हल्द्वानी समेत कई वन प्रभागों में अब बाघ संरक्षण का दायरा बढ़ाया जा रहा है। इन क्षेत्रों को पहली बार अलग से बजट उपलब्ध कराया गया है, जो अब तक केवल टाइगर रिजर्व तक सीमित था। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा “टाइगर आउट साइड टाइगर रिजर्व” (टीओटीआर) योजना के तहत यह पहल की गई है। देश में अनुमानित 3682 बाघों में से करीब 30 प्रतिशत बाघ टाइगर रिजर्व के बाहर के वन क्षेत्रों में रहते हैं। ऐसे में इन इलाकों में भी संरक्षण को मजबूत करने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। इस योजना के तहत लैंसडोन, रामनगर, तराई पश्चिमी, हल्द्वानी, केंद्रीय पूर्वी और तराई केंद्रीय वन प्रभागों को 90-90 लाख रुपये की धनराशि दी गई है। इस बजट से प्रत्येक वन प्रभाग में घायल, बीमार या आबादी वाले क्षेत्रों में भटककर आए बाघों के लिए विशेष रेस्क्यू कक्ष बनाए जाएंगे। लगभग 10 लाख रुपये की लागत से तैयार होने वाले ये कक्ष बाघों को सुरक्षित रखने में मदद करेंगे। अब तक बाघों को रेस्क्यू कर ढेला रेस्क्यू सेंटर में रखा जाता था, जहां जगह की कमी की समस्या सामने आ रही थी। नए कक्ष बनने से इस केंद्र पर दबाव कम होगा और स्थानीय स्तर पर ही बाघों का उपचार व देखभाल संभव हो सकेगी। शेष धनराशि से वन विभाग आधुनिक उपकरणों की खरीद करेगा। इनमें बाघों को पकड़ने और स्थानांतरित करने के पिंजरे, बेहोश करने वाली दवाएं, थर्मल ड्रोन, कैमरा ट्रैप, जीपीएस सिस्टम, वायरलेस संचार उपकरण, हाई बीम टॉर्च, सुरक्षा उपकरण और गश्ती दल के लिए आवश्यक संसाधन शामिल हैं। साथ ही मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम और कार्यशालाएं भी आयोजित की जाएंगी। तराई पश्चिमी वन प्रभाग के डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्या के अनुसार, दक्षिणी जसपुर रेंज के कृपाचारजपुर बीट में मिनी टाइगर सेंटर की स्थापना की जा रही है, जो इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने बताया कि वन प्रभागों में पहले से पशु चिकित्सकों की उपलब्धता होने से घायल बाघों का इलाज भी शीघ्र किया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना उत्तराखंड में बाघ संरक्षण के प्रयासों को और मजबूत करेगी। इससे न केवल बाघों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि स्थानीय लोगों और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाने में भी मदद मिलेगी।