दशकों से प्रशिक्षण के बावजूद सेवा नियमावली नहीं बनने पर लैब टेक्नीशियनों का प्रदर्शन

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देहरादून। उत्तराखंड के सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की रीढ़ माने जाने वाले प्रशिक्षित बेरोजगार लैब टेक्नीशियनों के सब्र का बांध आखिरकार टूट गया। अपनी विभिन्न लंबित मांगों को लेकर मंगलवार को 'मेडिकल लैब टेक्नोलॉजिस्ट संघ' के बैनर तले सैकड़ों युवाओं ने सचिवालय कूच किया। इस दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच तीखी नोकझोंक और धक्का-मुक्की देखने को मिली। पुलिस ने सचिवालय से कुछ ही दूरी पर भारी बैरिकेडिंग लगाकर प्रदर्शनकारियों को रोक लिया, जिससे नाराज बेरोजगार सड़क पर ही धरने पर बैठ गए और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

सड़क पर हंगामा और जाम बढ़ता देख पुलिस प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को जबरन वाहनों में भरा और उन्हें एकता विहार धरना स्थल ले जाकर छोड़ दिया। इसके बाद आक्रोशित लैब टेक्नीशियनों ने वहीं पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है। आंदोलनकारियों का साफ कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे पीछे नहीं हटेंगे। आंदोलन की शुरुआत में संघ की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि भी अर्पित की गई। संघ के पदाधिकारियों ने राज्य सरकार की नीतियों पर तीखा आक्रोश व्यक्त किया। संघ के महासचिव मयंक राणा ने कहा कि राज्य गठन से पहले से ही प्रदेश में बीएससी एमएलटी पाठ्यक्रम संचालित हो रहा है, जिससे हर साल सैकड़ों छात्र-छात्राएं डिग्री लेकर निकल रहे हैं। बेहद अफसोस की बात है कि राज्य गठन के 26 साल बाद भी सरकार इन लैब टेक्निशियनों के लिए एक स्पष्ट सेवा नियमावली और स्थाई रोजगार की व्यवस्था नहीं कर पाई है। पंजीकृत और प्रशिक्षित होने के बावजूद युवा सड़कों पर खाक छानने को मजबूर हैं। महासचिव मयंक राणा ने आरोप लगाया कि एक तरफ प्रदेश का युवा बेरोजगार है, तो दूसरी तरफ सरकार सरकारी अस्पतालों की प्रयोगशालाओं (लैब्स) को पीपीपी (PPP) मोड पर निजी कंपनियों के हवाले कर रही है। उन्होंने कहा "सरकार इस तरह के आत्मघाती फैसलों से न सिर्फ स्थाई रोजगार के अवसर हमेशा के लिए खत्म कर रही है, बल्कि इससे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने पर्वतीय क्षेत्रों की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पहाड़ी जिलों के ग्रामीण इलाकों में लैब टेक्निशियनों की भारी कमी है। इसके कारण गरीब ग्रामीणों को खून, पेशाब जैसी छोटी-मोटी जांचों के लिए भी मीलों दूर जिला मुख्यालयों या निजी सेंटरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इससे समय की बर्बादी तो होती ही है, साथ ही उन पर भारी आर्थिक बोझ भी पड़ता है। संघ के पदाधिकारियों ने दोटूक शब्दों में सरकार को चेताया है कि यदि उनकी जायज मांगों पर जल्द ही सहानुभूतिपूर्वक और ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो वे अपने आंदोलन को और अधिक उग्र करने के लिए मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।