Thursday, May 30, 2024
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Homeस्वास्थ्यइस ख़ास तकनीक से इंसानो के पास पहुंच जाते है मच्छर

इस ख़ास तकनीक से इंसानो के पास पहुंच जाते है मच्छर

अगर आपके आस पास मच्छर हैं तो वे आपको खोज कर काट ही लेंगे. क्या वाकई यह एक सच्चाई है. क्या मच्छर बड़ी कुशलता से इंसानों को खोज ही लेते हैं और उन्हें काटकर उनका खून चूस लेते हैं? अगर वाकई ऐसा है तो वे ऐसा आखिर करते कैसे हैं. कई वैज्ञानिक इसके पीछे इंसान की गंध से उन्हें पहचानने के लिए मच्छरों की सूंघने के तंत्र की क्षमता को जिम्मेदार मानते हैं. नए अध्ययन में वैज्ञानिकों वजह पता लगाई कि कैसे और क्यों मच्छरों में इंसानों को खोज लेने की इतनी शानदार क्षमता होती है.

खास रसायन की मदद से
सामान्यतः मच्छर कार्बन डाइऑक्साइड और इंसान के पसीने को सूंघने के लिए खास तरह के कैमोरिसेप्टर्स का उपयोग करते हैं. ये रसायन उनके एंटीना में होते हैं और विशेष संवेदी स्पर्शक में होते हैं. इस अध्ययन के मुताबिक मच्छरों की कम से कम एक प्रजाति एडिज एडिप्टी में तो दूसरे जानवरों की तुलना में गंध सूंघने का तंत्र अलग ही तरह से संयोजित होता है.

बिना कैमोरिसेप्टर्स के भी
बोस्टन यूनिवर्सिटी और रॉकफेलर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि जब मच्छरों की इतना ही नहीं मच्छर की ये प्रजातियां तब भी इंसान को खोजने में सफल रहीं जब इसांनों के पसीने को पहचानने वाले कैमोरिसेप्टर्स अक्षम करने पर भी वे इंसान को पहचान में सफल रहे थे.

जीन एडिटिंग तकनीक
शोधकर्ताओं ने CRISPR जीन एडिटिंग तकनीक का उपयोग कर ऐसे मच्छर विकसित किए जिनमें सूंधने की तंत्रिकएं चमकने वाले प्रोटीन प्रदर्शित करते हैं और कुछ खास गंधों के पास होने पर माइक्रोस्कोप में चमकती हैं. इससे शोधकर्ता यह जानने में सफल रहे के कैसे अलग अलग गंध उन मच्छरों के गंध सूंघने के तंत्र को उत्तेजित करती हैं.

एक तंत्रिक, एक रिसेप्टर वाले तंत्र के विपरीत
शोधकर्ताओं ने पाया कि एजिप्टी में बहुत से सूंघने वाले संवेदी रिसेप्टरस एक तंत्रिका से जुड़े होते हैं. यह प्रक्रिया कोएक्सप्रेशन कहलाती है. उनके मुताबिक यह घ्राण विज्ञान के मूल सिद्धांत को बदलने का काम करती है जिसके मुताबिक हर तंत्रिका से केवल एक ही कैमोरिसेप्टर जुड़ा होता है. बोस्टन यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट और वरिष्ठ लेखक मेग यंगर कहती हैं कि यह बहुत ही हैरान करने वाली अजीब बात है इसकी उम्मीद नहीं की गई थी.

कम से कम दोगुने रिसेप्टर्स
यंगर ने बताया कि घ्राण या सूंघने के विज्ञान के साथ दुविधा यह है कि संवेदी तंत्रिकाएं, जैसे इंसानों के लिए जो नाक में रहती हैं, हर एक एक ही तरह की सूंघने वाले रिसेप्टर को प्रदर्शित करती है. यह एपिस मेलिफेरा प्रजाति की मधुमक्खियों,मनड्यूका सेक्सटा नाम के तंबाकू हॉर्नवार्म, और सामान्य मक्खियां (डआसोफिला मेलानोगास्टर) के लिए सही है जिनमें उतने ही कैमोसेंसर रिसोप्टर्स हैं जितने की दिमाग में ग्लोमेरुली यानि घ्राण संवेदी संकेत प्राप्त करने वाली गोलाकार संरचनाएं होती हैं. लिकन ए एजिप्टी में जितनी ग्लोमेरुली होते हैं उनसे कम से कम दो गुने रिसेप्टर्स होते हैं जो कि बहुत ही असामान्य है.

हम नाकाम क्यों होते  हैं

इस अध्ययन के नतीजे में शोधकर्ताओं को ऐसे असामन्य गंध सूंघने वाले तंत्र का पता चला जिसमें हर एक तंत्रिका में बहुत सारे संवेदी रिसेप्टर्स स्थित हैं. इससे मच्छरों की इंसान कोसूंघ लेने की बहुत ही शक्तिशाली क्षमता का पता चलता है और यही वजह है कि हम मच्छरों को खुद तक पहुंचने से रोकने में अब तक नाकाम क्यों होते रहते हैं.

इस शोध का लक्ष्य ऐसे मच्छर निरोधकों को बेहतर और ज्यादा कारगर बनाना है जो इंसान की गंध को प्रभावी तौर से छिपा सकें या ऐसे आकर्षण पैदा करने वाले रसायन बनाएं जिससे मच्छरों का ध्यान भटक जाए क्योंकि इंसान या जानवर के खून की मादा मच्छरों को प्रजनन के लिए बहुत जरूरत होती है. मच्छरों की इसी प्रतिभा के कारण ही इंसानों में डेंगू, मलेरिया, जीका, पीला ज्वर जैसी कई बीमारियां होती हैं जिसने हर साल करीब सात लाख लोग मरते हैं.

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